मनुष्य केवल अपनी कही हुई "इच्छाओं" से नहीं चलता, बल्कि उन छिपी हुई इच्छाओं से चलता है, जिन्हें वह स्वयं भी पूर्ण रूप से नहीं समझता। क्योंकि मनुष्य का समय वहीं जाता है, जहां उसका आंतरिक मन जाना चाहता है।
जुबाँ हर रोज नए सपनों का ऐलान करती है, मगर रूह का रूख कुछ और होता है। इंसान चलता नही अपनी कही हुई राहों पर, वह बहता है वहां जहां उसका मन चाहता है।
मैं सफल होना चाहता हूं, लेकिन समय व्यर्थ चला जाता है। मैं कुछ और बनना चाहता हूं, पर जीवन कहीं और और जा रहा है। बड़ी परेशानी होती है, जब आप जिस दिशा में समय लगाना चाहते है उस दिशा में समय नही लगता है। जिस कार्य को करना चाहाते है वह कार्य नहीं हो पाता।
इसका कारण जानने के लिए आपको जीवन के दो महत्पूर्ण आयामों को समझना होगा।
- मन
- चाहत
मनुष्य का 'मन' चाहत' से अधिक गहरा होता है तथा मनुष्य की इच्छाएं ऊपरी सतह पर कार्य करती है जो तुलनात्मक चाहत जैसी ही होती है।.............
ध्यान रहें इच्छाएं और चाहत बदलती रहती है। अब हमे इस बात को समझना होगा की कुछ इच्छाएं प्रकट होती है, और कुछ इच्छाएं दबी हुई होती है।
प्रकट इच्छाएं - प्रकट इच्छाएं वे इच्छाएं होती हैं जिन्हें आप दूसरों के सामने व्यक्त करते हो। अर्थात जो इच्छा दिखाई दे रही है, वही प्रकट इच्छा है। कोई व्यक्ति कहता है, मुझे जज बनना है, मैं सुबह जल्दी उठूंगा, मैं गुस्सा छोड़ दूंगा, ये सभी प्रकट इच्छाएं है।ध्यान रहें - प्रकट इच्छा हमेशा मन की गहराई नहीं होती।
अप्रकट इच्छाओं का तूफान - वे इच्छाएं जो व्यक्ति दुनिया से छिपाकर रखता है वही इच्छाएं भीतर लगातार हलचल पैदा करती है और जीवन की दिशा तय करती है। आप सभी भली भांति इस बात को जानते हो कि आपका जीवन उन इच्छाओं से अधिक प्रभावित हुआ है जो दिखाई नहीं देती। आपके जीवन में अप्रकट इच्छाओं का एक ऐसा तूफान चल रहा है। अब आप इस बात को समझ चुके हो, की आप दुनिया के सामने चाहे जो कुछ भी बनने का नाटक कर लो लेकिन आपका अंतर्मन आपको क्या बना रहा है आप भली-भांति जानते हो।
अब आप इस बात को स्वीकार करें की आपका समय वही व्यतीत हो रहा है। जहां दबी हुई इच्छाएं करवाना चाहती है। जैसा की अब आप समझे गये होंगे की दबी हुई इच्छाएँ कितनी ज्यादा ताकतवर होती है। क्योंकि दबी हुई इच्छा के अंदर जो चलता है वही हम सभी के वास्तविक जीवन मे घटता रहता है। इसका मतलब जो इच्छाये हम समाज के सामने प्रकट करते है, वह तो केवल दिखावा मात्र है।
मूल विचार - मनुष्य केवल बाहरी संकल्पों से नहीं बदलता, बल्कि तब बदलता है जब उसका लक्ष्य उसके, भीतर की गहरी इच्छा बन जाए"
मनुष्य को पहले यह पहचानना होगा कि वास्तव में उसके भीतर मन मे क्या चल रहा है। क्योकि अक्सर व्यक्ति बाहर कुछ और कहता है, लेकिन भीतर से कुछ और चाहता है।
उदा - व्यक्ति कहता है, की मुझे पढ़ाई करनी है। लेकिन दबी हुई इच्छा आराम, आलस्य, मनोरंजन, प्रशंसा, भोग आदि की और आकर्षित करती है। इसीलिए जब तक व्यक्ति अपनी वास्तविक' आंतरिक इच्छा पर नियंत्रण नहीं करेगा तब तक उसका बाहरी लक्ष्य कमजोर व असफल रहेगा। .......योजना का सबसे गहरा हिस्सा "प्रकट इच्छा को दबी इच्छा के अन्दर ले जाएं"
इसका अर्थ - जो लक्ष्य अभी केवल बोला हुआ "संकल्प” है उसे धीरे धीरे मन की गहराई में उतारना होगा। "लक्ष्य केवल शब्द न रहें" बल्कि स्वभाव बन जाना चाहिए। एक दिन ऐसा आयेगा की आपकी 'प्रकट इच्छा' 'आतंरिक इच्छा' बन चुकी होगी जो इच्छाएं आपको भटका रही थी धीरे-धीरे वो अपना प्रभाव खो देंगी और आपका लक्ष्य आपके मन की मुख्य दिशा बन चुका होगा
निष्कर्ष - मनुष्य का जीवन, उसकी बाहरी इच्छाओं से नहीं बल्कि उसकी "आतंरिक इच्छा" से संचालित होता है। इसलिए बाहरी लक्ष्य को भीतर की चाह बनाना होगा, लंबे समय तक अभ्यास करना होगा, केवल बोले गए संकल्प जीवन नही बदलते, जीवन बदलने के लिए संकल्पों को मन की छिपी हुई प्रवृति बनना होगा।समझ का अँधेरा के सभी अध्याय एक ही स्थान पर पढ़ें