खुद को सफल बनाने की खोज में, मैं अपने घर से चला और आज वकील सुर्खियों के साधक से मिला।
मैंने जीवन में एक समय ऐसा देखा, जहां मुझे सफलता से अधिक असफलता को समझने की जिज्ञासा हुई।
क्योंकि सफल व्यक्ति अक्सर अपनी चमक दिखाता है, लेकिन असफल व्यक्ति अनजाने में अपने जीवन का सच खोल देता है।
मैं उन लोगों से मिलने निकला जिन्हें समाज बहुत "प्रतिभाशाली" कहता था।
- बस थोड़ा सा रह गया था
- इस बार इंटरव्यू तक पहुंच गया था
- बहुत तेज लड़का है
- किस्मत खराब रही, वरना अधिकारी बन जाता
मैं सुनता रहा। फिर मैंने तय किया कि केवल सुनूंगा नहीं, देखूंगा भी। मैं उनके कमरों तक गया। उनकी बातचीत सुनी उनकी जीवन की वास्तविकता को महसूस किया।
और जो मैंने देखा, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया। मैंने पाया कि उसमें से बहुत से लोग सफलता प्राप्त करने की तैयारी नहीं कर रहे थे, वे केवल संघर्ष करते हुए दिखाई देने की तैयारी कर रहे थे। कोचिंग में प्रवेश लेने से पहले ही उन्होंने अपने भीतर एक काल्पनिक महानता का निर्माण कर लिया था। किताबें खुलने से पहले ही संघर्ष की कहानी लिखी जा चुकी थी। पढ़ाई शुरु होने से पहले ही त्याग का प्रदर्शन शुरू हो चुका था। उन्हें ज्ञान से अधिक यह अच्छा लगता था कि लोग उन्हें "बहुत मेहनती "समझें।
वे घटों इस बात पर चर्चा करते रहें कि...
- उन्होंने कितनी कुर्बानियां दी
- कितने साल बबर्बाद कर दिए
- लोग उन्हें समझते नहीं
- समाज प्रतिभा की कद्र नहीं करता
लेकिन जब उनके वास्तविक कर्मों को देखा... तो वहां निरंतरता नहीं थी, अनुशासन नहीं था, गहराई नहीं थी, सच्ची तपस्या नहीं थी। केंवल एक चीज थी....................अपने संघर्ष की घोषणा। मैंने देखा कि बहुत से छात्र पढ़ाई कम और अपने "संघर्ष" का प्रचार अधिक कर रहे थे। उन्हें परिणाम से पहले पहचान चाहिए थी। सम्मान से पहले योग्यता नहीं, सम्मान का वातावरण चाहिए था। वे ऐसे बात करते थे जैसे दुनिया उनके भविष्य की ऋणी हो। लेकिन जीवन घोषणाओं पर नहीं चलता। प्रकृति केवल कर्म देखती है। दुनिया के सामने उन्होंने अपने चारों ओर संधर्ष का धुआ खड़ा कर रखा था, लेकिन भीतर आग बहुत कम थी।
कुछ लोग तो ऐसे मिले जिनके बारे में वर्षों से कहा जा रहा था -
- इसका चयन हो गया था...
- बस मेडिकल में रह गया..
- बस दो नंबर... से रह गया...
लेकिन जब वास्तविकता को खोजा गया, तो उनके दावों का कोई अस्तित्व ही नही मिला तब मुझे पहली बार समझ आया कि संसार में बहुत से लोग असफल इसलिए नहीं है कि उनमें क्षमता नहीं। बल्कि इसलिए है क्योंकि उन्होंने "सफलता की वास्तविक यात्रा शुरू ही नहीं की। कुछ लोग अपने जीवन में इतने खोखले हो चुके है कि अब उनके पास वास्तविक उपलब्धि नहीं है लेकिन वे चाहते है। कि लोग कहें कि "बहुत संघर्ष कर रहा है..." चाहे वह संघर्ष वास्तविक हो या नहीं। मुझे समझ आया की.... जिस दिन मनुष्य कर्म से अधिक उसकी चर्चा का आनंद लेने लगे, समझ लेना चाहिए कि उसका ध्यान लक्ष्यं से हट चुका है। क्योंकि वास्तविक साधक का चेहरा बोलता है। उसकी असफलता पर रोने का मन करता है। जिस बीज में वृक्ष बनने की क्षमता होती है, वह हर दिन यह घोषणा नहीं करता कि एक दिन में जंगल बन जाऊंगा। सूर्य उगने से पहले शोर नहीं करता। नदी बहने से पहले प्रमाण नहीं देती। अग्नि जलने से पहले घोषणा नही करती । क्योंकि प्रकृति अभिनय पर नहीं चलती । तुम लोगों से तालियां प्राप्त कर सकते हो, लेकिन नियति से परिणाम नहीं। उस दिन मुझे समझ आया.......................
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